आवारा कुत्तों को बस ‘हटाने’ से समस्या हल नहीं होगी, ज़रूरी है संतुलित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
— शिवांशु सिंह
दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) से सभी आवारा कुत्तों को हटाने के सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं जन्म दी हैं। जहां आम जनता के एक बड़े वर्ग ने इसे राहत की तरह देखा, वहीं पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) और पीपल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) जैसे पशु कल्याण संगठनों ने इसका विरोध किया है।
निश्चित रूप से, हाल के दिनों में कुत्तों के हमले और रैबीज़ से मौत जैसी घटनाओं ने चिंता बढ़ाई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में इन कुत्तों को “इच्छा मात्र” से सड़कों से गायब किया जा सकता है? दिल्ली में अनुमानित आठ लाख आवारा कुत्तों की आबादी है, और यह समस्या केवल दिल्ली-एनसीआर तक सीमित नहीं, बल्कि देश के लगभग हर शहर और गांव में मौजूद है।
कुत्तों को पकड़कर कहीं और छोड़ देने से समस्या खत्म नहीं होती। यह एक विशाल और जटिल कार्य है—कहां रखा जाएगा, कितने संसाधन लगेंगे, उनके भोजन और देखभाल की व्यवस्था कैसे होगी—ये सब बड़ी चुनौतियां हैं।
समाधान के तौर पर सबसे पहले आवारा कुत्तों की नसबंदी (Sterilisation) बड़े पैमाने पर की जानी चाहिए, ताकि उनकी संख्या नियंत्रण में रहे। साथ ही, सभी कुत्तों को एंटी-रैबीज़ वैक्सीन दी जाए। यह कार्य कठिन ज़रूर है, लेकिन पूरे कुत्ता-जनसंख्या को हटाने से अधिक व्यावहारिक है।
यह भी समझना होगा कि सभी आवारा कुत्ते आक्रामक नहीं होते और न ही सभी रैबीज़ से पीड़ित होते हैं। कुत्ते पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं—वे प्राकृतिक सफाईकर्मी के रूप में कचरा नष्ट करते हैं। शोध यह भी बताते हैं कि जिन कुत्तों को नियमित भोजन मिलता है, वे प्रायः आक्रामक नहीं होते।
किसी एक घटना के बाद “सबको मार दो” जैसा भावनात्मक निर्णय न तो तार्किक है और न ही व्यवहारिक। यह वैसा ही है, जैसे किसी एक व्यक्ति के अपराध के लिए पूरी आबादी को दंडित कर देना।
समस्या गंभीर है, लेकिन इसका हल संतुलित, वैज्ञानिक और संवेदनशील दृष्टिकोण से ही निकलेगा। आठ लाख कुत्तों को पकड़कर कहीं और ले जाना न तो आसान है और न ही आवश्यक। कुत्ते, चाहे आवारा हों, जीवन रखते हैं और उनका भी संरक्षण ज़रूरी है। उन्हें बस “हटाने” से समस्या नहीं सुलझेगी—इसके लिए धैर्य, विवेक और दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है।