शिबू सोरेन: एक ऐसा नाम जिसने भारत के आर्थिक सुधारों को गिरने से बचाया
रिपोर्ट: शिवांशु और स्वप्निल | संपादन: निहाल कुमार दत्ता

नई दिल्ली। झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री रहे झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक नेता शिबू सोरेन का  निधन हो गया। उनके राजनीतिक जीवन के कई रंग रहे, लेकिन एक ऐसा अध्याय है जिसे इतिहास कभी नहीं भुला सकेगा— जब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार को विश्वास मत में समर्थन देकर भारत में शुरू हुए आर्थिक सुधारों को बचा लिया।

1991 में जब देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था और सरकार के पास विदेशी मुद्रा भंडार बेहद कम हो चुका था, तब प्रधानमंत्री बने नरसिम्हा राव ने डॉ. मनमोहन सिंह को अपना वित्त मंत्री बनाया। डॉ. सिंह, जो उस समय यूजीसी के अध्यक्ष और पूर्व आरबीआई गवर्नर रह चुके थे, ने देश की आर्थिक दिशा को नई राह दी— उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की। लेकिन इन ऐतिहासिक सुधारों की नींव तभी बची रह सकी, जब राव सरकार 1993 में विश्वास मत में बाल-बाल बची। और इस बचाव के पीछे एक बड़ा नाम था— शिबू सोरेन।

1993: जब सरकार का गिरना तय माना जा रहा था

बाबरी मस्जिद विध्वंस (6 दिसंबर 1992) के बाद कांग्रेस और भाजपा के रिश्ते में खटास आ गई। इससे पहले भाजपा, जो राव सरकार के आर्थिक सुधारों को परोक्ष रूप से समर्थन दे रही थी, विपक्ष में होते हुए भी टकराव की स्थिति में नहीं थी। लेकिन मस्जिद गिरने के बाद तीन भाजपा शासित राज्यों— उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारें बर्खास्त कर दी गईं। आरएसएस पर प्रतिबंध लगा। भाजपा ने नाराज़ होकर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन कर दिया।

वाम दल, जनता दल और भाजपा— तीनों विरोधी ध्रुवों की पार्टियां— पहली बार एकजुट हो गईं और सरकार को गिराने का अवसर बना। संसद में राव सरकार अल्पमत में दिखने लगी। कुल 542 सांसदों में राव के पास बहुमत नहीं था। माना जा रहा था कि सरकार अब गिरेगी ही।

तब आगे आए सोरेन, और बचा ली सरकार

झामुमो के पास लोकसभा में छह सांसद थे, जिनमें से दो बागी हो गए। शेष चार सांसदों ने शिबू सोरेन के नेतृत्व में राव सरकार का समर्थन किया। कहा जाता है कि उस समय कांग्रेस ने झामुमो को समर्थन के बदले धनराशि दी, जिसका मामला वर्षों तक अदालत में चला। शिबू सोरेन पर भ्रष्टाचार और हत्या के आरोप भी लगे, हालांकि बाद में उन्हें अदालत से राहत मिली।

भूतपूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह के पुत्र अजीत सिंह भी जनता दल से अलग होकर लगभग 20 सांसदों के साथ राव के समर्थन में आए, लेकिन वह संख्या भी काफी नहीं थी। राव सरकार को जो संजीवनी मिली, वह झामुमो के चार सांसदों की ही थी। परिणामस्वरूप 265 वोट सरकार के पक्ष में और 251 विपक्ष में पड़े। अगर झामुमो के चार सांसद राव के पक्ष में मतदान न करते, तो सरकार गिर जाती और देश के आर्थिक सुधार बीच रास्ते में दम तोड़ देते।

एक निर्णय, जिसने देश की दिशा बदल दी

शिबू सोरेन का यह फैसला केवल एक राजनीतिक समर्थन नहीं था, बल्कि भारत के आर्थिक इतिहास की दिशा तय करने वाला मोड़ था। अगर राव सरकार गिर जाती, तो संभव है कि देश आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता की गर्त में चला जाता। जो उदारीकरण की प्रक्रिया 1991 में शुरू हुई थी, वह अधूरी रह जाती और भारत आज जिस आर्थिक ऊंचाई पर है, वह सपना अधूरा रह जाता।

डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में शुरू हुए सुधार आज भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में ला खड़ा कर चुके हैं। लेकिन इन सुधारों की नींव को बचाने में शिबू सोरेन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


आज जब देश उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है, तब यह याद रखना ज़रूरी है कि एक समय ऐसा भी आया था जब उनके फैसले ने न केवल एक सरकार को बचाया, बल्कि एक पूरे देश की आर्थिक नियति को बदल दिया।

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