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अमर शर्मा
नक्सलवाद का अंत, लेकिन ‘लोन वुल्फ’ की तलाश जारी—क्या सच में खत्म हुआ खतरा?
नई दिल्ली/झारखंड: देश में दशकों से चले आ रहे नक्सलवाद के खिलाफ सरकार ने बड़ी सफलता का दावा किया है। केंद्र सरकार के अनुसार 31 मार्च 2026 तक भारत को “नक्सल मुक्त” बनाने का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह भी बताती है कि खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
अमर शर्मा अपने विश्लेषण में लिखते हैं कि नक्सलवाद भले ही अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका हो, लेकिन इसके कुछ अवशेष अब भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बने हुए हैं। विशेष रूप से शीर्ष नेतृत्व का पूरी तरह खत्म न होना इस बात का संकेत है कि खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है।
‘लोन वुल्फ’ बना सबसे बड़ा खतरा
रिपोर्ट के मुताबिक, CPI (माओवादी) का वरिष्ठ नेता मिसिर बेसरा अब भी सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से बाहर है और उसे संगठन का आखिरी बड़ा चेहरा माना जा रहा है। बताया जाता है कि वह झारखंड के घने सारंडा जंगलों में छिपा हुआ है और अलग-अलग नामों से सक्रिय है।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, अब नक्सलियों की संख्या 150 से भी कम रह गई है और उनमें अधिकांश निचले स्तर के कैडर हैं। बावजूद इसके, शीर्ष स्तर के कुछ नेता अब भी सक्रिय हैं, जो “लोन वुल्फ” की तरह काम कर सकते हैं।
नेतृत्व खत्म, लेकिन विचारधारा बाकी
विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों ने बड़े नेताओं को निशाना बनाकर नक्सल नेटवर्क को कमजोर किया है। कई बड़े कमांडर मारे गए, गिरफ्तार हुए या मुख्यधारा में लौट आए, जिससे संगठन की रीढ़ टूट गई।
लेकिन अमर शर्मा यह भी सवाल उठाते हैं कि क्या केवल सैन्य कार्रवाई से किसी विचारधारा का अंत संभव है? उनका मानना है कि जब तक सामाजिक-आर्थिक असमानताएं और स्थानीय असंतोष पूरी तरह खत्म नहीं होते, तब तक ऐसी विचारधाराएं किसी न किसी रूप में बनी रह सकती हैं।
सरकार की सफलता, लेकिन सतर्कता जरूरी
गृह मंत्री द्वारा संसद में नक्सलवाद के अंत की घोषणा को सरकार की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। यह 50 से अधिक वर्षों तक चले संघर्ष का अंत माना जा रहा है, जिसने कभी देश के 100 से ज्यादा जिलों को प्रभावित किया था।
खतरा छोटा, लेकिन खत्म नहीं
अमर शर्मा अपने लेख में निष्कर्ष देते हैं कि नक्सलवाद अब अपने अंतिम दौर में जरूर है, लेकिन “लोन वुल्फ” जैसे तत्वों के रहते पूरी तरह निश्चिंत होना जल्दबाजी होगी।
सरकार के लिए यह समय जीत का जश्न मनाने के साथ-साथ सतर्क रहने का भी है, ताकि नक्सलवाद किसी नए रूप में फिर सिर न उठा सके।