डिजिटल दौर में बचपन की मजबूती का सवाल: तकनीक के बीच सुरक्षित और संतुलित परवरिश की जरूरत
लेखक: अमर शर्मा | (TWM News – विचार)
नई दिल्ली:
आज का बचपन पहले की तुलना में कहीं अधिक डिजिटल हो चुका है। मोबाइल, सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने बच्चों को जानकारी और अवसरों की नई दुनिया दी है, लेकिन इसके साथ ही गंभीर खतरे भी सामने आए हैं। ऐसे समय में “रेज़िलिएंट डिजिटल चाइल्डहुड” यानी मजबूत और संतुलित डिजिटल बचपन की अवधारणा बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।
डिजिटल माध्यमों ने जहां बच्चों को रचनात्मकता और सीखने के नए रास्ते दिए हैं, वहीं यह भी सच है कि अनियंत्रित ऑनलाइन वातावरण उन्हें मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक जोखिमों के बीच ला खड़ा करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आज का डिजिटल सिस्टम बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा उनके ‘एंगेजमेंट’ यानी जुड़ाव को प्राथमिकता देता है, जिससे वे ऐसे कंटेंट के संपर्क में आ जाते हैं, जिसे समझने या संभालने की क्षमता उनमें नहीं होती।
समस्या केवल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और नीतिगत चुनौती भी बन चुकी है। भारत जैसे देश में, जहां करोड़ों बच्चे इंटरनेट से जुड़े हैं, वहां अब तक बच्चों के डिजिटल जीवन को नियंत्रित करने के लिए कोई व्यापक और स्पष्ट नीति ढांचा विकसित नहीं हो पाया है।
डिजिटल दुनिया का एक बड़ा खतरा यह है कि यह बच्चों को वास्तविक जीवन से दूर कर देती है। लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से सामाजिक संवाद, खेलकूद और मानसिक संतुलन पर असर पड़ता है। शोध बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम से चिंता, अवसाद, नींद की कमी और आत्मविश्वास में गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
इसके बावजूद, समाधान केवल डिजिटल उपकरणों को छीन लेना नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को तकनीक से दूर करने के बजाय उन्हें सही दिशा में उपयोग करना सिखाना ज्यादा जरूरी है। परिवार, स्कूल और सरकार—तीनों को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां बच्चे डिजिटल दुनिया में सुरक्षित रहते हुए भी वास्तविक जीवन से जुड़े रहें।
इस दिशा में कुछ जरूरी कदम हैं—जैसे बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म, मजबूत कंटेंट मॉडरेशन, अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी और बच्चों के साथ खुला संवाद। साथ ही, बच्चों को खेल, कला और सामाजिक गतिविधियों से जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि उनका समग्र विकास हो सके।
अंततः, डिजिटल युग में बचपन को सुरक्षित रखना केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। अगर समय रहते सही कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ी का बचपन स्क्रीन और एल्गोरिद्म के बीच खो सकता है।
(लेखक स्वतंत्र विचारक हैं)
**(TWM News)**