भाजपा नए अध्यक्ष की नियुक्ति में क्यों कर रही है देरी?
नई दिल्ली।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में नए अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर राजनीतिक हलकों में गहरी जिज्ञासा बनी हुई है। पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा जनवरी 2023 से ही अपने विस्तारित कार्यकाल पर काम कर रहे हैं। उनका तीन साल का कार्यकाल 19 जनवरी 2023 को पूरा हो गया था, लेकिन लोकसभा चुनावों तक उन्हें पद पर बनाए रखने का निर्णय हुआ। इसके बाद उनका कार्यकाल दिसंबर 2024 तक बढ़ा दिया गया। अब 2025 का अधिकांश समय बीत चुका है, फिर भी भाजपा ने नए अध्यक्ष की घोषणा नहीं की है।
भाजपा में यह स्थिति अभूतपूर्व मानी जा रही है क्योंकि सामान्यतः पार्टी समय पर नियुक्तियां करती रही है। नड्डा जनवरी 2020 में अध्यक्ष बने थे और अब तक छह साल से भी अधिक समय बीत चुका है। वे पहले कार्यवाहक और फिर पूर्णकालिक अध्यक्ष रहे। इस लिहाज़ से देखें तो उन्होंने लगभग दो कार्यकाल पूरे कर लिए हैं।
भाजपा विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है, जिसके 2025 तक 18 करोड़ से अधिक सदस्य हैं। पार्टी ने 2014 से लगातार तीन आम चुनावों में जीत दर्ज की है। हालांकि 2024 में पूर्ण बहुमत से थोड़े अंतर से चूक गई, लेकिन एनडीए गठबंधन ने मिलकर सरकार बना ली। आज पार्टी 14 राज्यों में अकेले और 5 राज्यों में गठबंधन के साथ सत्ता में है। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पार्टी के व्यापक विस्तार और विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समीकरणों के कारण नए अध्यक्ष की नियुक्ति पर सहमति बनाने में समय लग रहा है। भाजपा में संगठन और सरकार की बागडोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के हाथों में है, लेकिन पार्टी अध्यक्ष को भी व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि सही उम्मीदवार चुनने को लेकर गहन मंथन चल रहा है।
भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के रिश्तों को लेकर कई अटकलें लगाई जाती हैं, लेकिन अंदरखाने किसी टकराव की स्थिति नहीं है। भाजपा की पूरी वैचारिक जड़ें संघ से जुड़ी हैं। यह तय है कि अगला अध्यक्ष संघ की पृष्ठभूमि वाला और वैचारिक रूप से पूरी तरह प्रतिबद्ध नेता ही होगा। फर्क केवल इतना होगा कि वह पार्टी के संगठनात्मक मामलों को किस अंदाज़ में संभालता है।
सूत्रों के मुताबिक, संघ चाहता है कि अगला अध्यक्ष केवल वैचारिक रूप से दृढ़ न हो, बल्कि वह सार्वजनिक रूप से भी उसी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करे। पार्टी में लगातार अन्य दलों से आए नेताओं की संख्या बढ़ी है, जिससे परंपरागत कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष पनपा है। ऐसे में नए अध्यक्ष के चयन में इस पहलू पर भी ध्यान दिया जा रहा है कि वह संगठनात्मक ढांचे और विचारधारा के बीच संतुलन साध सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अब जल्द ही सर्वसम्मति बनाकर नए अध्यक्ष का नाम घोषित करेगी। लेकिन तब तक सवाल यही है कि आखिर भाजपा जैसे अनुशासित दल में नियुक्ति में इतनी लंबी देरी क्यों हो रही है?