आरएसएस 100: एक सूक्ष्म आंदोलन जिसकी उपस्थिति प्रचंड है
शिवांशु सिंह
चाहे कोई इसे स्वीकार करे या न करे, यह एक निर्विवाद सत्य है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) आज एक राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है, जिसकी जड़ें देश के हर राज्य, दक्षिण से लेकर उत्तर-पूर्व तक गहरी पैठ बना चुकी हैं।
स्वतंत्रता से पहले जिस तरह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की उपस्थिति भारत की पहचान हुआ करती थी, स्वतंत्रता के बाद वैसी ही पहचान आज संघ की हो चुकी है। जिस प्रकार उस दौर में कांग्रेस के बिना भारत की कल्पना असंभव थी, ठीक उसी प्रकार आजादी के बाद भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक धारा को संघ के बिना समझ पाना कठिन है।
संघ के आलोचकों और संशयवादियों की आपत्तियों के बावजूद, यह संगठन राष्ट्रीय अस्मिता की भावना को गढ़ने में असाधारण योगदान कर चुका है। जैसे कांग्रेस ने स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रवाद की ज्वाला भड़काई थी, वैसे ही स्वतंत्रता के बाद संघ ने राष्ट्र चेतना को जीवंत बनाए रखा और उसमें समान सफलता प्राप्त की।
संघ आज विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है, जिसके लगभग 50 लाख सक्रिय सदस्य हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अन्य संस्थाओं की तुलना में इसकी विशेषता यह है कि यहाँ सदस्यता केवल औपचारिक नहीं, बल्कि सक्रिय और संगठित भूमिका में है। यही कारण है कि इसके स्वयंसेवक लगातार समाज जीवन में उपस्थित रहते हैं।
संघ की सबसे बड़ी उपलब्धि भारतीय जनता पार्टी को संगठित शक्ति देने और उसे लगातार केंद्र व राज्यों में जीत दिलाने के साथ-साथ राष्ट्रीय विमर्श की धारा तय कराने में रही है। भाजपा और संघ का रिश्ता दुनिया में अनोखा है। भाजपा जहाँ संघ परिवार का हिस्सा है, वहीं संगठनात्मक स्वायत्तता भी रखती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस रिश्ते को और सुदृढ़ किया है। उन्होंने खुले मंचों से संघ की राष्ट्र निर्माण में भूमिका को रेखांकित किया और उसे उचित सम्मान दिया।
यह उल्लेखनीय है कि संघ प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं उतरता, न ही किसी “अतिरिक्त संवैधानिक” सत्ता की तरह सरकार पर नियंत्रण रखता है। फिर भी, विचार और विमर्श की दिशा तय करने की उसकी क्षमता निर्विवाद है। संघ का कार्यपद्धति शब्दों की चकाचौंध से नहीं, बल्कि मौन और अनुशासित कर्म से है। यही कारण है कि वह मीडिया या प्रचार से दूरी बनाए रखता है और “निस्वार्थ सेवा” को अपने आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है।
संघ की ताकत उसके 80,000 दैनिक शाखाओं में निहित है। सुबह-शाम होने वाली ये शाखाएँ केवल शारीरिक और वैचारिक अभ्यास ही नहीं, बल्कि संवाद और विमर्श का मंच हैं। यहीं से विचार परिवार और समाज तक पहुँचते हैं और धीरे-धीरे राष्ट्रीय विमर्श में परिवर्तित हो जाते हैं।
संघ ने अपने सौ वर्षों के इतिहास में अनेक संकट झेले हैं। महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में, आपातकाल के दौरान, और 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगा। किंतु प्रत्येक बार सरकारें अपने आरोप सिद्ध करने में असफल रहीं और संगठन पुनः मजबूती से खड़ा हुआ।
यद्यपि संघ समर्थक बहुसंख्यक रूप से भाजपा के साथ हैं, परंतु अन्य दलों में भी उसके प्रति झुकाव रखने वाले लोग मिल जाते हैं। कांग्रेस के भीतर भी ऐसे लोग हैं जो अपने शीर्ष नेतृत्व से अलग राय रखते हुए संघ के सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान को स्वीकार करते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सामाजिक पुनर्निर्माण आंदोलन है, जिसने भारत की पहचान को उसकी प्राचीन संस्कृति और इतिहास से जोड़कर मुख्यधारा में लाने का कार्य किया है। अनुच्छेद 370 का हटना और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण उसी स्वीकृति और विमर्श की परिणति है।
सौ वर्षों की इस यात्रा में पीढ़ियों के स्वयंसेवकों और प्रखर नेतृत्व ने यह साबित कर दिया है कि उनके लिए “राष्ट्र सर्वोपरि” केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन का मंत्र है। यही संघ की शक्ति और स्थायी उपस्थिति का रहस्य है।