बिहार 2025 में महिलाओं का झुकाव बदल सकता है सत्ता का समीकरण
बिहार की राजनीति में महिलाएँ अब निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। 2010 से लगातार महिलाओं की मतदान प्रतिशतता पुरुषों से अधिक रही है। यही कारण है कि सभी दल उन्हें लुभाने के लिए विशेष योजनाएँ और भावनात्मक अपील लेकर मैदान में उतर चुके हैं।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शराबबंदी नीति से जो राजनीतिक बदलाव की शुरुआत हुई थी, वह अब नकद हस्तांतरण, योजनाओं और वायदों की जंग में बदल चुकी है। महिलाओं के इस वोट बैंक में जाति और वर्ग से परे एक साझा शक्ति दिखाई देती है।
आंकड़े इस बदलाव की गवाही देते हैं। हर विधानसभा चुनाव में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही है और उन्होंने नतीजों को प्रभावित भी किया है। नीतीश कुमार का लंबा कार्यकाल काफी हद तक महिलाओं की इस मजबूती पर टिका रहा। बहुत सी महिलाओं का मानना है कि शराबबंदी ने उनके घरों को घरेलू हिंसा और आर्थिक बर्बादी से बचाया।
आगामी चुनाव से पहले यह संघर्ष और तेज हो गया है। राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत पात्र महिलाओं को 10,000 रुपये देने की घोषणा की है, जो आचार संहिता लागू होने से कुछ ही हफ्ते पहले शुरू की जा रही है। वहीं विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने एलपीजी सिलेंडर पर सब्सिडी, मासिक भत्ता और बेटियों की पढ़ाई से जुड़ी सुविधाओं के वादे किए हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुकाबले में भावनात्मक अपील का तड़का लगाया है। एक वर्चुअल संबोधन में उन्होंने विपक्ष द्वारा उनकी दिवंगत माता को अपशब्द कहे जाने का जिक्र करते हुए कहा, “मोदी माफ कर सकता है, लेकिन बिहार किसी माँ का अपमान कभी बर्दाश्त नहीं करेगा।” इस बयान से उन्होंने मातृत्व की भावनाओं को जोड़कर महिलाओं के समर्थन को मजबूत करने की कोशिश की है।
यह लड़ाई सिर्फ पैसों और भावनाओं की नहीं है। बिहार राज्य जीविका निधि साख सहकारी संघ लिमिटेड की शुरुआत इस दिशा में नई रणनीति को दर्शाती है। यह योजना नीतीश काल के जीविका कार्यक्रम का विस्तार है, जिसने 1.4 करोड़ से अधिक महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों के जरिए उद्यमिता और सामाजिक दायित्वों से जोड़ा है। सीधे लाभ देने की बजाय यह मॉडल दीर्घकालीन साझेदारी और सशक्तिकरण पर जोर देता है।
बिहार की राजनीति में यह एक बड़ा बदलाव है। जहाँ पहले चुनाव पूरी तरह जातीय समीकरणों पर आधारित होते थे, वहीं अब महिलाएँ उन धारणाओं को तोड़ती नज़र आ रही हैं। कई बार उन्होंने अपने घर-परिवार की जातिगत निष्ठाओं के विपरीत मतदान किया है। यही कारण है कि महिलाएँ दलों के लिए सबसे अनुशासित लेकिन साथ ही सबसे अप्रत्याशित मतदाता समूह बन चुकी हैं।
वोटरों के इस वर्ग को आकर्षित करने के लिए योजनाएँ, नकद लाभ और भावनात्मक अपील ज़रूर असर डाल सकती हैं। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या महिलाएँ खुद को सिर्फ लाभार्थी मानेंगी या राज्य के भविष्य की दिशा तय करने वाली वास्तविक हिस्सेदार भी बनेंगी।
Report – Amar Sharma